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मध्यप्रदेश की साहित्य अकादमी

हिन्दी को गरिमापूर्ण स्थान तक पहुँचाने में लेखकों, कवियों, प्रचारकों, पत्रकारों, समाचार माध्यमों और हिन्दी सेवी संस्थाओं का अप्रतिम योगदान रहा है। मध्यप्रदेष में जिन संस्थाओं ने हिन्दी के विस्तार का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कार्य किया उनमें म.प्र. साहित्य परिषद् के रूप में स्थापित आज साहित्य अकादमी के रूप में सक्रिय संस्था का नाम अग्रणी संस्थाओं में गिना जाना है। हिन्दी को भारत में ही नहीं विदेशों तक विस्तारित कर इसके सभी प्रकार के रूपों एवं विचारों को समाज के समक्ष लाने में इसका योगदान माना जाता है।


मध्यप्रदेश के पृथक गठन से पूर्व शासन साहित्य परिषद् का 1954 में नागपुर में गठन किया गया। मध्यप्रदेश बनने के बाद इसके कार्यालय का स्थानातंरण प्रदेश की राजधानी भोपाल में षिक्षा विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त इकाई के रूप में हुआ था। वर्तमान में 2003 से मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् का गठन मध्यप्रदेश संस्कृति विभाग ने किया जिसके अंतर्गत अब इसका नाम परिवर्तन कर साहित्य अकादमी हो गया है। मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् अपनी गतिविधियों द्वारा प्रदेश में साहित्य संस्कृति संगीत नृत्य रूपकर रंगकर्म और रचनात्मक कार्यक्रम की श्रृंखला आयोजित करती है।


साहित्य अकादमी संस्कृति परिषद् की अनुशंग इकाई होने के बावजूद प्रदेश में साहित्य के क्षेत्र में स्वतंत्र स्वायत्त सृजन कर्मियों की संस्था के रूप में लोकप्रिय है। नागपुर से भोपाल स्थानातंरण के समय बहुसंख्य मराठी भाषा की सुविधा के लिए शासन साहित्य परिषद् के अंतर्गत मराठी प्रभाग काम करता था। वर्षों से प्रदेश के मराठी साहित्य संस्कृति प्रेमियों के इस विभाग को दो दशकों से निष्क्रीय कर दिया गया था। वर्तमान में इसका वर्ष 2008 में पुर्नगठन किया गया है। अब साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद् के अंतर्गत मराठी प्रभाग ने कार्य किया तथा साहित्य एवं मराठी संस्कृति पर केंद्रित एक दर्जन से अधिक आयोजन करता है।


साहित्य अकादमी ने प्रदेश के हिन्दी भाषा समाज के लिए ये एक अनुभाग वर्षों तक कार्यरत रहा वर्तमान में हिन्दी साहित्य अकादमी की स्थापना स्वतंत्र हो चुकी है।
साहित्य और साहित्यकारों के संरक्षण प्रोत्साहन सृजनात्मक परिस्थितियों के विकास क्रम को दूरस्थ स्थानों तक पहुँचाने का सतत् क्रम वर्षभर जारी रहता है। वरिष्ठ लेखकों की स्मृति एवं सतत् युवा रचनाशीलता को मंच देने के लिए अकादमी द्वारा अनेक समारोहों का आयोजन किया जाता है।


लेखकों की पहली कृति के प्रकाशनार्थ पाण्डुलिपि सहायतानुदान दिया जाता है इस सहायता से लेखक अपनी कृति को प्रकाशित करने के लिए प्रकाशकों की सहायता से प्रकाशित करवा कर वितरित कर सकता है। प्रतिवर्ष इस योजना को बहुप्रसारित कर पाण्डुलिपियाँ आमंत्रित की जाती है तथा एक उच्च स्तरीय साहित्यक मंडली उनके चयनित पाण्डुलिपियों को प्रकाशनार्थ अनुदान की अनुशंसा करती है।


पाठकमंच केन्द्रों का संचालन प्रदेश के कस्बे तक इस अभिनव योजना को भारत में सर्वप्रथम स्थापित करने का सबसे प्रतिष्ठित मंच माना जाता है। इस योजना के अंतर्गत पाठकमंच संचालक का चुनाव इस तरह किया जाता है जो स्थानीय स्तर पर सृजनरत लेखक कलाकार होता है। प्रदेश में अब लगभग 60 पाठकमंच स्थापित है। इन पाठकमंच केन्द्रों को वर्ष के प्रतिमाह दो-दो पुस्तकें कहानी, कविता, उपन्यास, यात्रा संस्मरण पौराणिक पृश्ठभूमि पर लिखी पुस्तकें एवं आठ पत्रिकाएँ निशुल्क भेजी जाती है, पाठकमंच संचालक का दायित्व होता है कि वह जिज्ञासु एवं पठनषील पाठकों तक उन पुस्तकों को उपलब्ध कराता है प्रतिमाह पाठकमंच इन पुस्तकों पर परिचर्चा भी आयोजित करता है अकादमी चुनी हुई गोष्ठी रपटों का प्रकाशन अपनी मासिक पत्रिका साक्षात्कार में भी करता है।


साक्षात्कार पत्रिका हिन्दी साहित्य की अग्रणी पत्रिका के रूप में 1976 में त्रैमासिक, द्विमासिक और बाद में अब पिछले दो दशको से मासिक पत्रिका के रूप में प्रकाशित होती है। पत्रिका में समकालीन रचनाशीलता आलोचना विमर्ष समसामयिक लेख और किसी विशिष्ट सृजनशील व्यक्तित्व को केन्द्र में रखकर विशेषांक, प्रत्येक अंक में साक्षात्कार का प्रकाशन करती है। अब तक साक्षात्कार के 412 अंक प्रकाशित हो चुके है। इस पत्रिका ने अनेक साहित्यक विभूतियों की सृजनशीलता को एकत्रित कर उनके संपूर्ण सृजन कार्य पर विशेषांकों का प्रकाशन भी किया है जिनमें प्रमुख नाम इस प्रकार हैरू- चंद्रधर शर्मा, गुलेरी ठाकुर, जगमोहन सिंह, अयोध्यासिंह उपाध्याय, हरिऔध, महावीर प्रसाद द्विवेदी, प्रतापनारायण मिश्र, बालकृश्ण भट्ट, पंडित रामचंद्र शुक्ल, राहुल सांस्कृत्यापन, माधवराव सप्रे, शमशेर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, अशोक वाजपेयी, गुलशेर खाँ शानी, नरेश मेहता, शिवमंगलसिंह सुमन और युवाओं पर केंद्रित अंक चर्चित रहे हैं। प्रवासी लेखन विशेषांक- मतवाला, विश्वकविता, कहानी अंक, कथा विशेषांक, नरेश मेहता, रामविलास शर्मा, राम कुमार वर्मा, समजातीय मराठी साहित्य विशेषांक, आपातकाल गुजरात।


अकादमी साहित्य के शास्त्रीय और लोकप्रिय विषयों पर केंद्रित अंर्तसंबंधों और समकालीनता को केन्द्र में रखकर पुस्तकों का प्रकाशन भी करती रही हैं। अन्वेषक और दस्तावेजीकरण के और कला माध्यमों के बीच संवाद स्थापित करने के लिए अब तक कुल 52 पुस्तकों का प्रकाशन किया जा चुका है। साहित्य अकादमी की प्रकाशित पुस्तकों को अब प्रामाणिक संदर्भ ग्रंथ माना जाता है। इनमे से कुछ को छोड़कर सभी विक्रय के लिए उपलब्ध है। इन प्रकाशनों के प्रचार प्रसार के लिए अकादेमी प्रादेशिक, राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय पुस्तक मेलों में भागीदारी करती है। संस्कृति विभाग के विभिन्न आयोजनों के दौरान इनकी प्रदर्षन विक्रय का काम किया जाता है।